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Poetries

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कविता प्रियंका सग्गू की कलम से . . .

जीवन में जीवन में चलते चलते बड़ी बार थक जाती हूं मै कभी कभी डगर पर टूट जाती हूं मै जैसे तैसे अपने हिस्से उठा कर जोड़ती हूं मगर फिर से उठ जाती हूं मै अपने सभी बिखरे सपने फिर से संजोती हूं मै जरूरी ये नही कि क्या पाती …

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कवितायें सावन शर्मा की कलम से . . .

कुछ तो लिखा है मेरी तक़दीर में तेरे लिए या तो तेरा होना या तेरे लिए रोना मुद्दतो बाद कोई राह मिली इश्क़ की, जिसकी मन्ज़िल है तू तेरे इतना करीब हो कर तेरे नहीं चाहता तुझसे दूर होना  खोजा करता हु राह में शायद कभी तुझसे हो मिलना पर …

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कवितायें अभिषेक व्यास की कलम से . . .

मेरे मज़हब की जंजीरें मेरे मज़हब की जंजीरें, मुझे कैदी बनाएं, मेरी आत्मा, मेरे तन को जैसे छोड़ जाए, मुझे मालूम ना था इस कदर और यूहं बटूंगा , मेरे मज़हब की मशाल मे , मैं यूहं जलूँगा। कोई पगड़ी, कोई बुरका , कोई जनेउ पहनें, मजहब के नाम पर …

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कविता अक्षय शेलार की कलम से . . .

हम जिन्हे गुनगुनाएँ ऐसे गाने कहा है हमें झूम उठाए ऐसे तराने कहा है हमें सीखने की चाहत हो भले जितनी पर हमें सिखा सके ऐसे सयाने कहा है हम तुमसे दूर होकर भले और पास आएँगे मगर तुमसे दूर जाने के बहाने कहा है हमें सुनने की चाहत हो …

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कवितायें अर्पित कुलश्रेष्ठ की कलम से . . .

यातनायें तेरे इश्क़ से बेहद इश्क़ किया मर मिटना तो बहुत आसान बात थी मैने तो अपनी रूह को तेरे लिए कुर्बान किया पर क्या सिला दिया तूने मेरी मोहबत का मुझे अपने दूसरे आशिक़ो के साथ इश्क़ की पथरीली सड़क पर लहूलुहान छोड़ दिया अरे! क्या फर्क रहा उनमे …

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कवितायें हिमांशु वर्मा की कलम से . . .

सोच रहा हु क्या लिखु, ये रात का सन्नाटा या दिल में उठा यादो का सैलाब लिखु। उस हसीन की खामोशी या उसका हाल ऐ दिल लिखु। उसकी मज़बूरी का हाल या उसके त्याग की कहानी लिखु। उस हसीन की बात करती आँखे या शरारत करते हुए लबो की दास्ता …

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कवितायें हंस राज की कलम से . . .

हुकूमत को सच कहाँ स्वीकार होगा हुकूमत को सच कहाँ स्वीकार होगा जो बोलेगा वो गिरफ्तार होगा। जो लब करने लगेगी अब बगावत उसी गर्दन पर फिर तलवार होगा । उसे अब खेंच लाओ दफ्तरों से बहुत होगा तो वो बीमार होगा । उजड़ेगी मजलूमों की बस्तियां जब खड़ा उसपर …

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कवितायें तिशा अग्रवाल की कलम से . . .

मस्ती के वो दो पल कहाँ गए मस्ती के वो दो पल, जो हमें पूरी दुनिया से अलग कर जाया करते थे । कहाँ गए मस्ती के वो दो पल, जो भीड़ में न होने के बावजूद, पूरी दुनिया का एहसास कराया करते थे। कहाँ गए मस्ती के वो दो …

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कवितायें इम्तियाज़ खान की कलम से . . .

जाने वो कौन सी दुनिया है जाने वो कौन सी दुनिया है जहां जाकर कोई नहीं आता आसमानों से भी दूर कहीं ज़मीन का कुछ तो है नाता जाने वो कौनसी दुनिया है नींद जहां से चलकर आती है है खुद ही जब यहाँ भेजा फिर वापस क्यूँ बुलाती है …

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कवितायें आकांक्षा भटनागर की कलम से . . .

“ ज़िन्दगी जो अब बेस्वाद लगने लगी है” रह गुज़र सा रह गया हूँ हवा के इंतज़ार में बारिश भी अब वो सुकून नहीं दे पाती ज़िन्दगी जो अब बेस्वाद लगने लगी है अकेले दिल को बहलाता हूँ बैठा है जो अंधकार में मिलन भी अब वो ख़ुशी नहीं दे …

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