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Poetries

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वज़ूद by Neetu Virk

वज़ूद हर इंसान जीता है जो ज़िंदगियाँ एक सबके साथ और एक अपने साथ सबके साथ वाली आसान मुश्किल बहुत मुश्किल मगर अपने साथ जीना और वही है शायद असली ज़िन्दगी जो ‘ज़िन्दगी’ से परे भी ले जाती है कभी छोटे छोटे लम्हों में मुक्ति, निर्वाण, ज्ञान और ना जाने …

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सब याद है मुझे by Tamanna

सब याद है मुझे सब याद है मुझे …… वो छोटे छोटे कदमो से चलकर पहली बार स्कूल जाना माँ का हाथ छोड़ कर पा की तरफ देखना… ‘आज वापस ले चलते हैं न!’ पा का माँ प्यार से कहना और फिर माँ का पा को ज़बरदस्ती बहार ले जाना …

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मैं अहिंसा का पुजारी by Abhishek Vyas

मैं अहिंसा का पुजारी मैं हूँ एक अहिंसा का पुजारी, फिर भी कटे हिंसा मे ज़िन्दगी सारी। लहू-लुहान है अब सबके वस्त्र, सबके हाथ थाम चुके है विभिन्न अस्त्र।। आज हर क्षण मन मेरा घबराएं, क्या कल हम जीवित रह पाएँ? इस गैर-मुल्क शब्द ने, आज क्या कर डाला, इंसानियत …

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पापा… by Ananya Jain

पापा… आज भी मेरा मन करता है कि जब मैं रोऊ, आप मेरे पास आकर पूछो, “बिट्टो, क्या हूआ?” आज भी मेरा मन करता है, जब मम्मी मुझे मारे, तब आप मुझे बचालो। आज भी मेरा मन करता है कि जब मैं खाना छोड़ कर बैठ जाऊँ तब आप मेरी …

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“तलाश” by सुरभी आनंद

“तलाश”  दायरो के मकड़जाल में        फड़फड़ाता हुआ जीवातमा    हैं वजूद की तलाश      आखिर क्यों आया यहां            उफना रही इच्छाएँ            कुछ कर गुजरने को            टिमटिमाती हुई इस लौ मे            अपने रूप में जीने को            खुद के प्रयासों से मैनें            …

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तुमसे मिलने की कोशिश करू by हिमांशु वर्मा

तुमसे मिलने की कोशिश करू । तुमसे मिलने की कोशिश करू । अपना बनाने की साजिश करू।। जितना मैं पास आउ उतना तुम दूर जाते , दुनिया की भीड़ में तुम हमसे ही गुम हो जाते, ज़मी से उड़कर तुम बादल में  छुप जाते, कोयल की कुक मे तुम ही …

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गज़ले विनोद रोहतकी की कलम से . . .

1  ये जिंदगानी क्या जिंदगानी है हर जिस्त क़ज़ा तलक़ जानी है हंसी का मंजर है बस बज़्म तक तन्हाई तो गम की मेजबानी है| क्यूँकर हम सब सलीके से सो गए रुत जो आई है रुत ये जानी है| रात भर सजाये थे चंद क़तरे शज़र ने याद के …

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कवितायें सुरभि पांडेय की कलम से . . .

मैं क्या करूँ ?  जिस दुःख का एहसास चार दिनों में तुझे ख़ोखला कर जाता है वो ग़म मैं हर रोज़ जीती हूँ जिस जुदाई से तुझे इतनी नफ़रत है वो दूरियां मुझे भी उतनी ही खलतीं हैं तू क्यों नहीं समझ पाता मेरी मजबूरियों को मैं भी जवाबदार हूँ …

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