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ओमर हाफ़िज़ – कश्मीर का एक बाशिंदा जो आम लोगो से अलग है

समाज से संघर्ष को मिटाया नहीं जा सकता, उसे बस कम किया जा सकता है। और जैसा कि टकराव वाले इलाकों में अक्सर होता है, संघर्ष ही वस्तु बन जाता है, जिसका फायदा कुछ लोग उठाते हैं।

विकास से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले ओमर हाफ़िज कहते हैं- ‘इस टकराव का फायदा उठाकर मीडिया हाउस अपनी टीआरपी बढ़ाने की कोशिश करती हैं। लंबे समय तक ऐसा होने पर रिपोर्टिंग में एक खालीपन आ जाता है, जिसका खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ता है जिनके मानवी संघर्ष की कहानी पर किसी का ध्यान नहीं जाता।’ कश्मीर जैसे इलाके में कमोबेश हर कोई विवाद से प्रभावित है। लेकिन 26 साल के ओमर सिर्फ कश्मीरी उग्रवाद, आर्मी या पत्थरबाजी पर बात नहीं करना चाहते हैं। वो कहते हैं कि ‘जो मैं करना चाहता हूं वो ज़रूरत पर आधारित एक सकारात्मक प्रयास है। मैं ये नहीं कह रहा कि टकराव नहीं है। मैं ये कह रहा हूं कि अब समय है, जब कश्मीरियों को सामान्य इंसान जैसा देखा जाए। उन्हें देश के बाकी लोगों के तरह ही जीने का मौका मिले।

वो कहते हैं कि ‘कश्मीर में दूसरी कहानियां भी हैं जिन पर ध्यान देना ज़रूरी है। जो कि उग्रवाद और पत्थरबाजी की कहानियों के नीचे दबे हुए हैं और अगर दुनिया को कश्मीरियों के बारे में बताना है तो। हाफ़िज कहते हैं कि ‘उग्रवाद और पत्थरबाजी की कहानियों से इतर कश्मीर में दूसरी कहानियां भी हैं जिन पर ध्यान देना ज़रूरी है। और उन कहानियों को सुनने के बाद ही कोई कश्मीरियों को सच में समझ पाएगा और सामाजिक समरसता और जीवन के स्तर में सुधार हो सकेगा।’ और यही कारण है कि वो खुद को एक एक्टिविस्ट बुलाने से कतराते हैं।

हाफ़िज का मानना है कि टकराव वाले एरिया में हालत सामान्य करने के लिए बाकी परेशानियों पर चर्चा करना जरूरी है। जैसे कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य, महिलाओं के अधिकार।

साल 2004 से हाफ़िज विकास से जुड़े कई सामाजिक मुहिम में सहयोग कर रहे हैं। इसमें आपदा प्रबंधन से लेकर सांस्कृतिक पहल शामिल है। उनके कुछ शुरुआती कामों में से एक था, ‘कश्मीरी महिलाओं की मानसिक स्वास्थ्य संघर्ष’, जिस पर वो दुनिया का ध्यान आकर्षित करना चाहते थे।

‘हम अक्सर ऐसी विधवा या ऐसी माओं के बारे में बात करते हैं जिन्होंने अपने बच्चे या पति पत्थरबाजी या उग्रवाद के कारण खो दिए। लेकिन ऐसे न जाने कितने परिवार हैं जिनका इस संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं है, फिर भी इस संघर्ष के कारण वो मानसिक रूप से प्रताड़ित हैं। जैसे कि -अगर घाटी में बंदी या कोई लड़ाई होती है तो उनके कारोबार पर असर पड़ता है। जो पुरुष घर चला रहा है, उसके रोजगार पर इसका असर पड़ रहा हो या फिर बच्चे इस कारण पढ़ाई नहीं कर पाते। इन सबका असर उस महिला पर पड़ता है जो कि परिवार को जोड़कर रखने का प्रयास कर रही है। मैंने खुद एक सर्वे से पता किया था कि डिप्रेशन कश्मीरी महिलाओं में महामारी के स्तर तक पहुंच गई है। यह तब है जब वो इस संघर्ष में सीधे तौर पर हिस्सा भी नहीं ले रही हैं। कश्मीर में होने वाले कुल आत्महत्या की कोशिश में 70 फीसदी प्रयास महिलाओं ने किए हैं। लेकिन इन बातों के बारे में कोई भी चर्चा नहीं करता है। कोई भी इस समाजिक बंटवारे के बारे में बात नहीं करता है, जो दिखता तो नहीं लेकिन बहुत हद तक लोगों के जीवन को प्रभावित करता है।’

साल 2016 में हाफ़िज ने देश के 22 राज्यों का दौरा कर ‘अठवास -हैंडशेक’ नाम से एक कैंपेन किया। जिसका मकसद शांति बहाल करना था। इस कैम्पेन के जरिए उन्होंने युवा कलाकारों को कश्मीरी संघर्ष को कला के माध्यम से दिखाने के लिए प्रोत्साहित किया। इस कैंपेन से अन्य लोगों में कश्मीरियों के प्रति हमदर्दी पैदा करने की भी कोशिश की गई थी। इस कैम्पेन के आखिर में एक डॉक्यूमेंट्री बनाई गई थी, जिसका नाम था ‘स्क्रीमिंग कैनवास’ जिसे अब तक लगभग 15 लाख बार देखा जा चुका है। इस प्रोजेक्ट से कश्मीरियों की परेशानियों को आम लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया था।

साल 2017 में उन्होंने ‘स्टीयर्स’ नाम से एक ऑनलाइन कैंपेन की शुरुआत की, जो पूरी तरह से ट्रांसजेंडर और महिलाओं के ऊपर था। इसमें उनकी परेशानियों, जिससे वो हर दिन गुजरती है, साथ ही पहचान और अधिकारों को लेकर बात की गई। इस प्रोजेक्ट को दो भागों में बांटा गया। ओमर सिर्फ ऑनलाइन सोशल मीडिया के माध्यमों से वालंटियर की कहानियों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे थे। इस कैंपेन से 55 देशों से लोग जुड़े और उन्होंने महिला और ट्रांसजेंडर के प्रति बुरे बर्ताव, सामाजिक और सांस्कृतिक कुरीतियों पर अपने विचार और एक्सपीरिएंस शेयर किए।

‘स्टीयर्स’ का एस – स्टीरियोटिपिकल यानी की रूढ़िवादी विचार के लिए और उन लोगों के आंसुओं के बारे में बताता है, जिनके साथ अन्याय हुआ है और समाज में मजबूती रखने वाले तबकों ने उनके साथ गलत किया है।’ हाफ़िज बताते हैं कि जैसे ही ‘स्टीयर्स’ के माध्यम से ट्रांसजेंडर के उन वीडियों को साझा किया गया, लोकल मीडिया ने तुरंत ही उन स्टोरी को उठाया। उसके बाद ऐसा पहली बार हुआ जब ट्रांसजेंडर को कश्मीर में बीपीएल का दर्जा मिला और उनके लिए बजट में प्रावधान किए गए।

फिलहाल ओमर ‘RegioD’ कैलेंडर पर काम कर रहे हैं। जिसके जरिए वो स्थानीय अनसुनी कहानियों को बताने की कोशिश कर रहे है। हम अक्सर भूल जाते हैं कि जम्मू कश्मीर तीन इलाके से मिलकर बना है – जम्मू, कश्मीर और लद्दाख और तीनों इलाकों के इस संघर्ष से जुड़ाव अलग तरीके से है।

ओमर असामान्यताओं को खत्म करने के लिए इंसानी जुड़ाव वाली कहानियों पर ज़ोर देते हैं, जिससे हर किसी की भावनाएं जुड़ सके। इसमें एक इलाके से दूसरे इलाके में पोस्टकार्ड भेजने का प्रस्ताव है। जो एक-दूसरे की संघर्ष और जीत की कहानी एक कैलेंडर के जरिए बयां करेगी। मैं कोशिश करूंगा कि जम्मू और कश्मीर बैंक इस कैलेंडर को अपने वार्षिक कैलेंडर में जगह दे क्योंकि यह बैंक तीनों इलाकों में अच्छी पकड़ रखता है। ये उन इलाकों में भी पहुंच रखता है, जहां सोशल मीडिया अब तक नहीं पहुंच पाया है। हाफ़िज़ चाहते हैं कि इस काम से सरकार की नीतियों में फर्क आये। ‘मैं अकेला कुछ महान बदलाव नहीं ला सकता। मैं बस चीज़ों को दूसरे तरीके से देखने का रास्ता तैयार कर रहा हूं, ताकि दूसरे लोग इस मुहिम से जुड़े और इसे आगे बढ़ सके।

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