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हां ये सच है by विनीत बाजपेई

हां ये सच है

हां ये सच है,
मिला नहीं वर्षों से उससे,
मगर जब याद आती है,
तो आंखें बंद करके ढूंढता हूँ,
अपने घर बदन के हर एक कमरे में।
सभी कमरों में सन्नाटा भरा है,
सांसों के आने-जाने की आवाज़ आती है।

बदन के बाएं हिस्से में एक कमरा है छोटा सा,
जिसकी दीवार पर अब भी तेरी तस्वीर टंगी है।
उसे उतारता हूँ,
अपने शर्ट की कफ़ से साफ करके
कुछ देर लगा कर सीने से वापस टांग देता हूँ।

उसी कमरे में एक अलमारी है छोटी सी,
जिसमे तुम्हारी सारी बातों,
सारी यादों को तहा कर रख दिया था,
उनको पलट कर देखता हूँ,
अच्छा लगता है। खुद को तुम्हारे पास पाता हूँ।
मगर जब आँख खुलती है तो फिर से लौट आता हूँ
अपने वीरां बसेरे में।

हां ये सच है, मिला नहीं वर्षों से उससे,
मगर जब याद आती है,
तो आंखें बंद करके ढूंढता हूँ,
अपने घर बदन के हर एक कमरे में।

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