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यादें by Tanuja Dutta

यादें

सालों बाद आज तुम्हें बाजार में देखा । पहले तो तुम आश्चर्य में थे कि मैं यहाँ कहाँ आ गयी ,फिर पलट कर अपनी पत्नी का हाथ पकड़ कर आगे बढ़ गए। मैं भी आश्चर्यचकित हो गयी तुम यहाँ कैसे ।

   “बाहर से ड्रिलिंग की आवाज और हथौड़े की आवाज से मेरा सिर दर्द से फटा जा रहा था । अपार्टमेंट में काम चल रहा था। उसमें तुम फ्लैट देखने आए थे , उसी दौरान तुम्हें देखा था । तुम्हें फ्लैट के बारे में जानना था । औपचारिकता वश हमने कुछ बातें की  ।। कुछ दिनों बाद तुम मेरे फ्लैट में रहने आ गए। ….हर छोटी छोटी चीजों के लिए तुम मेरा ही दरवाजा खटखटाते  ।इस तरह हमारी बातचीत शुरू हुई ।तुमसे बात करना मुझे भी अच्छा लगता। इस तरह  हम अक्सर बातें करते ।
    ….तुम नौकरी की तलाश में यहाँ आये थे । हर शाम मेरे पतिसे तुम्हारी घंटों बातें होती और मैं चाय बना बना कर लाती। धीरे धीरे अपनी बात फोन पर होने लगी। तुम जब भी घर पर होते तो फोन घुमाते और मैं भी जल्दी से काम निबटा कर तुम्हारे फोन का ईंतजार करती । मैं खुद में आये बदलाव को महसूस करती । तुम अपनी हर बात मुझे बताते जो भी तुम्हें ठीक लगता और मैं भी तुम्हें हर बात बताने लगी ।
मुझे हर वक्त तुम्हारे फोन का ईंतजार रहता , जिस दिन तुम्हारा फोन नहीं आता मेरा किसी काम में मन नहीं लगता था । ऐसी बात नहीं थी कि मुझे पति का प्यार नहीं मिला था । ….पहले जमाने की तरह इन्होंने न मुझे देखा था और न मैंने इन्हें।फिर भी आपसी समझ के कारण  हम दोनों में बहुत प्यार था । हमारी जिंदगी बहुत खुशहाल थी । मैं अपने पति और बच्चों में ही उलझी रहती ।  समय बदलता  गया बच्चे भी बड़े होने लगे  पति का तबादला भी दूसरे शहर में हो गया । मेरे लिए समय काटना बहुत मुश्किल हो गया । अकेलेपन को दूर करने के लिए  मैं कुछ न कुछ लिखा करती । मैं हर उस चीज को सीखना चाहती जिसमें मैं व्यस्त रहूँ । तुमसे दोस्ती के बाद मेरा अकेलापन कुछ कम हो गया । हम अक्सर एक दूसरे से हर बात साझा करते। तुम दिन में कई बार फोन लगाते  , मैं भी तुम्हें अपनी कहानियों के बारे में  तुमसे बातें करती और तुम भी बड़े ध्यान से सुनते ।
  एक बार तुमने ही बताया था , तुम्हारी शादी होनेवाली है । मैंने तुम्हारा मजाक बनाया था ।काफी देर तकबात करते करते हँसते रहे।उम्र के इस पड़ाव में आकर तुमसे बात करने की अजीब सी बेचैनी पर मैं हमेशा सोचती ‘मैं कुछ गलत तो नहीं कर रही ‘ फिर मन को तसल्ली देती कि बात के सिवा मैं अपनी पुरी  मर्यादा में रहती हूँ । कभी मैंने तुमसे ऐसी बात भी नहीं की जिसमें बेवफाई की बू आती हो । इस तरह अपनी दोस्ती और प्रगाढ़ होती गयी ।
   कुछ दिनों के बाद मेरे पति को उनकी कंपनी ने अपने ही शहर में भेज दिया । ऐसे ही एक दिन तुम्हारा फोन आया ,मैंने बाद में बात करुँगी कहकर फोन रख दिया । मेरी इसी बात से तुम नाराज हो गए । तुमने फोन करना बंद कर दिया ।मेरे फोन करने पर उखड़े हुए से तुम्हारा जवाब देना मुझे खलता था । मैं समझ नहीं पा रही थी ऐसा क्यों हुआ । मैं तुमसे  बार बार माफी माँगती रही लेकिन न तुमने माफ करना था सो नहीं किया । मैं सोचती रहती उसे तो पता हैकि मेरे पति और बच्चे हैंफिर तुम्हारी बेरूखी का कारण  समझ में नहीं आ रहा था । ऐसी बात भी नहीं थी कि मैंने तुमसे प्रेम भरी बातें की हों हमारी बातें तो सिर्फ इधर उधर की हुआ करती थींं । कभी तुम्हारे घर की कभी हमारे घर की ।
 …..तुम्हारी ये बेरूखी मेरी लाख कोशिशों के बाद भी समझ में नहीं आती । मेरा किसी काम में मन नहीं लगता । मैं सोचने लगी कि कहीं मुझे गलत औरत तो नहीं समझ रहा  है या मुझसे कुछ अपेक्षाएँ  रखता  है  । मैं अंदर ही अंदर घुट रही थी  । पति और बच्चे पुछते , मैं कोई न कोई बहाना बना देती । कभी कभी मुझे लगता तुमसे बात कर मैंने कोई गल्ती तो नहीं कर दी ।मैं हमेशा यही सोचती बातचीत के दौरान भी मैंने ऐसी कोई बात नहीं की जिसमें बेवफाई की बू आती हो । मन इस बात की तसल्ली करने की कोशिश करता औरत और मर्द का रिश्ता क्या वासना तक ही सीमित है?भावनात्मक रिश्ता नहीं हो सकता । फिर तुमने ऐसा क्यों किया
       ….किसी से पता चला तुम्हारी नौकरी किसी दूसरे शहर में लग गयी है । इसलिए तुम कभी दिखे नहीं । आज इतने सालों बाद तुम्हें देखकर फिर से पुरानी बातें याद आने लगी । तुम्हारी बेरुखी का कारण मैं समझ नहीं पायी ….बस यही सोचती रही “शायद तुम मेरी दोस्ती के काबिल ही नहीं थे ”  ।

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