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नज़म विनोद रोहतकी की कलम से . . .

1

एक बूढ़ा आदमी नाजुक शरीर

ठिगना कद लम्बे सुलझे बाल

एक अरसे से जो उठाये ह क्रांति मशाल।

ये क्रांति कोई नरसंहार नही मांगती

बस आदमी से आदमी का प्यार ही मांगती

गजब का आत्मविश्वास देखा उसकी आँखों में।

हमेशा सकारत्मक होती उसकी बातो में।

नेता वैज्ञानिक भला मानस अध्यापक क्या क्या उसके किरदार

क्या कोई निभा पाएगा इंसान।

हर युवा दिल तक पहुँचती उसकी आवाज़

उनकी हमेशा होती हौंसलो से परवाज(उड़ान)।

धीरे से चुपके से दुनिया से जुदा हुआ

अब तक कहाँ किसी को भरोसा हुआ

जो जलाई थी आपने मशाल

उसे हम लेके चलेंगे सर कलाम

तुम्हारे आदर्शो से जिएंगे

तुम्हारे विचार बोएंगे

आप जिओगे हमारी आँखों में

दिलो में उठते जज्बातों में

एक विद्यार्थी हूँ विद्यार्थी कहलाऊंगा

साथ ही कभी अध्यापक भी बन जाऊंगा

सादा जीवन निरंतर मेहनत और सौम्य व्यक्तित्व

यही झलकायेगा हमारा कृतित्व

हो जब कभी मेरा देह त्याग

लोग कहें, देखो आज फिर गया एक और कलाम

©विनोद रोहतकी

2

तुमने सुना है कभी असीम प्यार

मैने महसूस भी किया है इसे

ये भी हैरानियो भर सबब होगा

तुम जो जानोगे

मेरा प्रेम किसी स्त्री से नहीं

एक इमारत से है।

बड़ी ही मौन है ये इमारत

मुझे अक्सर इसमें विचरण करने का मौका मिला करता है।

अनगिनत ही इल्म ग्रन्थ रखेँ है यहाँ

यथास्थित क्रमांकित स्थानों पर।

मेरी हर सुबह यहाँ आकर ही दोपहर और शाम में तब्दील हो पाती है

मेरे दिल की कमी रहती है यहाँ पहुंचना

बहार प्रांगण की सतनाम कैंटीन

फूल और छायादार पेड़

एक किशोर जेफायर नाम का पीपल

पाठको के धूप से नहाये व्हीकल

युवतियों के झुण्ड

तंज कसते मलंग

बुद्धिजीवियो के चर्चे

मेरा बहस से तठस्थ रहके विचारक बनना

सब मेरे दिल को हिमोग्लोबिन भांति

हर रोज मिलना चाहिये

©विनोद रोहतकी

3

कभी किसी शाम चाय के कप से

उड़ती हुई भांप का बादल

उडा ले चलता है मुझे अपने साथ

अगले ही पल

मेरे कालेज की कैंटीन

दोस्तों का हुजूम

मेरा एकतरफा प्यार

मोहबतों क चर्चे

कुछ कोल्डड्रिंक्स , चाय के कप

और कुछ किताबें

अनायास ही मुझे घेर लेते हैँ।

आँखों में सजते मोती

दिल में फैला अवसाद

होठों पे अजब तबस्सुम बिखेर देते हैँ

जुग्नु सा जगमगाता

तारों सा टिमटिमाता

आफ़ताब सा चमकता

हमेशा ही खिलखिलाता

एक चेहरा मेरे ज़ेहन में उतर आता है।

मैं खोने लगता हूँ

उसी का होने लगता हूँ

शायद इसी होने को लेकर

मैं चाय के कप उड़ेलता हूँ।

फिर मेरा एहसास मेरे ख्वाब

एक साथ चलने लगते हैँ

अपने हाथ में मेरा हाथ थामे

वो भी साथ चलने लगते है।

हम गुजरते है धीरे से कालेज के लान से

छोड़ देते है हाथ अपने अपने

निकल जाती है जान फिर जान से।

अब एक साथ जाकर बेठे है लास्ट बेंच पर

बाते करते है जरा संभलकर

ये सिलसिला तब तक चलता है

मेरे हाथ से तेरा पेन फिसलता है।

अब तक ये चाय ठण्डी हो गई है

ख़त्म इस कलम की रोशनाई हो गयी है

जो बादल ले चला था मुझे इतनी दूर

अब तक बरस चूका था

आँखों ने सैलाब लुटाए थे

गम छुपा हम फिर मुस्कराए थे।

अब पुरे होशो हवश में

यही चाहता हूँ वो भी निकले तलाश में

मेरी ही तरह पर ख़ुशी से

मुझे पहचान ले बुतों की भीड़ में

मुस्करा दे लगा ले गले से।

मेरा ये चाय का प्याला जो हर रोज

ही मुझसे रहता है नाराज़

कभी तो वो आये हम इसे बाँट कर पी लें

दोनों ही खामोश हों

ऐसे इस कप का सफर मुक्कमल हो ।

©विनोद रोहतकी

4

एक कंधा हूँ बेज़ान सा,

गुमनाम सा

अनजान सा

और तलाश रही सदा ही

एक कंधे की।

जो कंधे से कंधा मिले

दिल की बात कही जाये, सुनी जाए

कंधो के रास्ते दिलों तक पहुंचे।

मिले बहुत ही कंधे मुझे पर नामुराद से

भौतिकियों से भरे बिना किसी जज्बात के।

मै चाहता था रोना सर रखके किसी कंधे पे

चाहता था भिगोना दामन उसका

कंधे से टपक के आंसू दिल से गुजरें।

उस संगदिल से भी कुछ मोम पिघलें।

धीरे से तलाश कुछ खत्म सी हुई

पर ये क्या अबके कंधे से

एक दिल आ मिला

अपनी कुछ सुनाने को

मुझे सुनना पड़ा, गले से लगाकर रोना पड़ा

मै कैसे किसी को उसी दुःख से गुजार दूँ

जिसमें मैँ ताउम्र जला हूँ।

अब मैं एक सरकारी कंधा हूँ

एक बूढ़े पेड़ सा हूँ

सब आते है, अपना दुःख सुनाते है

मुझे भी रुलाते है चले जाते है

मेरी सुनने को कोई तैयार नहीं

खुद का दुःख इतना कंधो पे इनके

समय कहाँ एक पेड़ की सुनने को।

अब बहुत हुआ और मैने

खुद को ही मार गिराया

दुःख में किसी के सरीक नहीं होता हूँ

किसी की नहीं सुनता हूँ

कोसते है मुझे मेरे ही चाहने वाले

एक जिंदा लाश सा चौक पे खड़ा हूँ

किसी को कहाँ है नसीब मेरी छाया भी अब।

शोले कब तक यूँ राख में दबे रहेंगे

अबके फिर से हवाएं चलेंगी

फिर से दौर बदलेंगे

हम नए दोस्त बनायेंगे

पुराने हमको भूलेंगे हम उनको भूल जायेंगे

इसी कवायद में जिन्दा हूँ कि

कोई कंधा मिलेगा मुझे जो

होगा बड़ा ही मेहरबान

मुझे लगा लेगा गले से

रोने देगा जोर से

मेरे अकेलेपन को मार गिरायेगा

काश मेरे लिए भी कोई कंधा आएगा।

©विनोद रोहतकी

रिश्ता

कुछ अक्श घूमते रहते है

इधर उधर फैले से रहते है

कुछ शब्द, अक्षर, जुगनुओं की तरह

जैसे कोई मतला बताना हो मुझे

कभी जो जोर देके समझू तो

तेरा चेहरा बना देते है

कभी कोई नज़्म लिख भी दूँ

पर कहाँ खत्म होता है सिलसिला

फिर तेरा कोई नया अक्श

मजबूर करता है मुझे

कोई नए शेर लिखने को

यूँ ही बेवज़ह तेरा रिश्ता है मुझसे

पर कितना सार्थक है न ये रिश्ता!

©विनोद रोहतकी

हुज़ूर

मजबूर है मजदूर

पैसे वाला नशाचूर

बिकने वाली हूर

सब वाज़िब है हुजूर।

मेरा फ़क़ीरी दस्तूर

तेरी अमीरी मशहूर

दिलों में फ़ितूर

लाज़वाब मेरे हुजूर।

यादों का कोहिनूर

वादों से भरपूर

यारा तेरा सरूर

क्या कहने हुजूर।

हुश्नों का गरूर

बेग़ैरत तू मगरूर

आइएगा आप जरूर

हमारी मज़ारे-इश्क़ हुजूर।

तौबा ये चेहरा-ए-नूर

फ़ितरते-मन का क़सूर

जो आ गए इतनी दूर

कसम से, न मुड़ेंगे हुजूर।

©विनोद रोहतकी

 

माफ़ी

हर बार जब भी मै

करता हूँ लिक्वर पार्टी

मुझे दो सिप के बाद ही

डैडी आप याद हो आते हो।

जब भी मै कभी दोस्तों को

पिलाता हूँ कोई महंगी दारु

खुद भी लुत्फ़ लेता हूँ

मुझे अनायास ही याद हो आता है

ये जो पैसे आपसे थे लिए

कुछ काम की झूठ कहकर

हर बार लगता है जैसे पी गया मै

आपका पसीना घोलकर।

आप डैडी मजदूरी करके

मुझे कितने ऐशो-आराम देते हो

मै नालायक ऐसे उड़ाता हूँ

आपके खून से बनी कमाई को

हो सकें तो मुझे माफ़ करना. . . !!!

©विनोद रोहतकी

माँ

सह लेता हूँ हंसते-हंसते सारी धूप-छाँव

निकलता हूँ घर से छूकर माँ के पाँव।

गोद में लेटाकर फिराती है सर पे हाथ

महीनों की थकान मिटती है, भरते है सब घाव।

कई दिनों बाद भी चेहरा खिला-खिला रहता है

जब कभी भी जाके आता हूँ अपने गाँव।

फख़्त एक माँ की दुआ अपने साथ हो

खींच लाएंगे साहिल पे तूफानों से नाव।

माँ का जिक्र न हो तो मेरे सजदे हराम हो

हरदम दुआ में वो रहे ऐसा उस से चाव।

©विनोद रोहतकी

शुक्रिया

वो एक हिस्सा चांदनी

लुटाई थी जो फ़जां ने मुझपे

वो कुछ क़तरे छाँव के

जो शजर ने मुझे अता किए

वो मेरे हिस्से की धूप

वो मेरे हिस्से का बसंत

वो मेरे हिस्से का आसमां

सब वक़्ते-रुखसत

तुझे दिए जाता हूँ।

मेरी तो पहचान है तीरगी से

तुम अपनी जिस्त रोशन रखना

मंजर कोई बुरा न कभी

ख्वाबों में पलने देना।

कभी कोई पल अनायास ही

मुझको याद करा दे

एक मोती ख़ुशी का

आँखों से छलका देना

मेरा गमे-हयात मिट जाएगा

शुक्रिया, यहाँ तक मेरे साथ

चलने का. . . . . !!!

©विनोद रोहतकी

सुख़नवर

कभी जो कोई सितमगरे-महोब्बत मिलें

कभी जो दिल आवाज़ दे

कभी जो कोई बावफ़ा याद आये

कभी जो महोब्बत रुलाए

कभी फिर अना रास्ते आये

एक सुख़नवर को याद करना

एक शायर को याद करना और

याद करना उसके क़लाम को

तुम्हें खुद पे गुमां होगा ।

जो लफ़्ज़ों के मोती बिखेरे थे तेरी याद में

जिनको कभी तेरी तवज्जो न मिली

जो बेनाम ही अंधेरो में

धूल फांकते रहे क़िताबों में।

जो आशिक़ था तुम्हारा

तूने कभी उसे सुना तक नहीं

कभी जो जाना होता उसका ग़म तो

ये जो दौर तुममें अब गुज़रा है

शायद तुम उसे, इससे बचा लेती

कभी जो उसे भी याद कर लेते

कभी जो अना परे रखके

उसको प्यार से देखते

ये मसला अब यूँ न खड़ा पाता

तुम्हे ये दौर पागल न बनाता।

अब जो हुआ, भूल जाओ

उसे पढ़ो और गुनगुनाओ

तुम बहुत खास थे उसके

फिर से खास हो जाओ

अपनी किस्मत पे इतराओ।

ये भी तुम अब जानते जाना कि

वो शायर अब नहीं रहा

वो जो सुख़नवर था अब ना रहा

वो भी अब रस्में-दुनिया निभाता है

लिख कुछ भी बाज़ार चलाता है

अब उसे भी महोब्बत जैसी

कोई शय याद नहीं रही।

ऐ काश! तुम पहले आते

काश एक शायर ज़िंदा रहता

शायद एक नाम-ए-हया जिंदा रहता।

©विनोद रोहतकी

यादों का कारवाँ

जाने किस पल

यादों का कारवां

कूचे-जां में आ ठहरे

कौनसे सुख के सिपाही

कहाँ के खुसी के नुमाइंदे

सब को धराशाही कर

तेरी यादों का लश्कर

बसा देता है एक गम महल

ये एल ऐसा सच है जो

मेरे बारहां नकारने पर

सच हो ही जाता है

हरदम।

©विनोद रोहतकी

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