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दुआ by Nikki Mahar

दुआ

 

बस इतना सा हमपर करम मौला करना,

मन से सभी के तू नफ़रत को हरना,

जब तक रहेगा तेरा नूर जग में,

बदलेगा आलम है उम्मीद हम में,

पोंछकर के आंसू रोते को हँसायें ,

देकर के सहारा गिरते के उठायें,

ये नेक सोच मालिक सबके दिलों में भरना

बस इतना सा हमपर करम मौला करना,

एक-दूजे का कारण खुशी का बनें हम,

मुस्कुराहट में बदलें,चाहे कितने ही हो गम,

सद्भाव समूचे जग के अंतर्मनों में भरना,

बस इतना सा हमपर करम मौला करना,

ये नफ़रत के बादल छटेंगे सभी,

चैन-ओ-अमन की बारिश होगी तभी,

चल सके जिन राहों पर मानव समूह,

ऐसी सद् राहों को उन्नत तू करना,

बस इतना सा हमपर करम मौला करना!

एक कविता ‘कविता’ के लिए 

 

जब मन की कश्मकश को,

 जुबाँ से नहीं जता पाती हूँ मैं,

हाँ तभी! ठीक तभी तुम याद आती हो,

तेरे साथ असहनीय पीड़ा भी,

 आसानी से सह जाती हूँ मैं,

किसी और को बयाँ करने में,

 झिझकती हूँ जिस बात पर,

वह बात आसानी से,

 संग तेरे कह पाती हूँ मैं,

होश संभाला मैंने जबसे,

 साथ तुमको पाया है,

लोरियों का रूप ले तुमने,

 कई बार मुझे सुलाया है,

तुम बचपन की ‘मछली जल’ में भी थी,

अब भाषा-पहलू की हर सीख भी हो,

मेरे भावों की तुम चिर शांति हो,

 तुम ही कटाक्ष की चीख भी हो,

जब भावों का ज़ामा ड़ाल शब्द पर,

 तुम सहसा कागज़ पर आती हो,

मेरे अटपटे अनकहे सवालों का,

 तब तुम उत्तर बन जाती हो..

हाँ तुम उत्तर बन जाती हो

सच तुम उत्तर बन जाती हो….

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