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Home / Gazal / गज़ले विनोद रोहतकी की कलम से . . .

गज़ले विनोद रोहतकी की कलम से . . .

1

 ये जिंदगानी क्या जिंदगानी है

हर जिस्त क़ज़ा तलक़ जानी है

हंसी का मंजर है बस बज़्म तक

तन्हाई तो गम की मेजबानी है|

क्यूँकर हम सब सलीके से सो गए

रुत जो आई है रुत ये जानी है|

रात भर सजाये थे चंद क़तरे शज़र ने

याद के मोती हैं कैसे कहूँ की पानी है|

होंठो पे सदाकत दिल में विसाले-यार

कितनी खूबसूरत ग़ज़ल की ज़बानी है|

कान्हा को आज पता लग जाना है

एक मीरा है और उसकी दीवानी है|

ये उरूजे-फन भी कैसा उरूज है

अपनी ही कोई तहरीर मिटानी है|

दौरे-इशरत की ये कहानी है

यादें अभी हद से बढानी है|

वजूद अपना गुलों की खुशबू जैसा

जो हवा चली तो बिखर जानी है|

टकरा लेता हूँ चट्टानों से रोटी खातिर

हौसला अब मुझमे भी खानदानी है|

गरूर बहुत है उसे हुस्नो-शोहरत पे

बतलाओ उन्हें, ये ऐसी शय हैं जो फानी है|

कल वो हमसे पूछ बैठे ‘विनोद’

क्या यही है मोहब्बत जो जिस्मानी है।

जीस्त- जिंदगी

क़ज़ा- मौत

बज़्म- महफ़िल

शज़र- पेड़

सदाकत- सच्चाई

उरूजे-फ़न : कला का बढ़ना

तहरीर: लिखावट

दौरे-इशरत : ख़ुशी का समय

फ़ानी: जो मिट जाये

©विनोद रोहतकी

2

अपने चारों और कुछ साये रहते है

कुछ तो अपने कुछ पराये रहते है|

जिंदगी तेरी दौर कहाँ खींच लायी हमें

वो घर भी छोड़ दिया जहां माँ-जाये रहते है|

कुछ तो जल होगा उसके अंदर भी

आंसू पलकों पे जगमगाये रहते है|

जो जुर्म करता है बड़ा बेबाक घूमता है

निर्दोष बिना वजह घबराये रहते है|

कोई तो ख़ता की है उसने आजकल

हमसे कुछ शरमाये शरमाये रहते है|

ये रास्ता किसने बताया है इन्हें

गम के साधू मेरे घर आये रहते है|

कितने नादां है ये अहले-वफ़ा

पराई आग मै हाथ जलाये रहते है|

कुछ तो मिज़ाज ही अपना खफ़ा है ‘विनोद’

कुछ दिल में बदगुमानी बसाये रहते है।

©विनोद रोहतकी

3

कभी जो तुम्हारे ख़त जला देता

तो भी क्या मै तुझे भुला देता|

सिर्फ इज्जत से पेट कहाँ भरा भाई

थोड़े बहुत पैसे भी कमा देता|

तुझसे तो बिछड़ा सो बिछड़ा

खुदा तुझसा कोई और मिला देता|

साहेबा ही तोड़ेगी तीर उसके

मिर्जे को काश कोई बता देता|

तेरी सहेली गर पूछती मेरा पता

क्या तू सचमुच मेरा ही पता देता|

इश्क़ ने भले मुझको अँधा किया था

तेरी तस्वीर मै ऐसे ही बना देता|

वो इतना कमजोर नही था ‘विनोद’ गर

टूटने से पहले कोई गले लगा लेता|

©विनोद रोहतकी

4

तीरगी की जानिब कोई उजाले निकालो।

एक पागलो का जत्था, कुछ दिलवाले निकालो।

गर्दिश में है चारों सिम्त नफरतों का जाल

बच्चों को घर से महोब्बतें सम्भाले निकालो।

वोट तो जब चाहे ले लेना नेता जी, पहले

हमारे हक़ के दो चार निवाले निकालो|

मुझको तो बेवफा जब चाहो कह दो

गनीमत है अपनी आँख के जाले निकालो।

सिर्फ खबरों से कब चलता है अखबार

आकाओं से कहो कि घौटाले निकालो।

तीरगी: अँधेरा

जानिब: तऱफ

5

 उससे मिलके यारों मै इतना बिखर गया

देख के मुझको आईना भी डर गया।

इतनी तिश्नगी थी उसे तेरे विसाल की

तूने बाहों में भरा और वो मर गया।

दीवाना तेरी बज़्म में यूँ पागल हो उठा

सुना है ‘मीर’ को गुनगुनाते हुए घर गया।

बावफ़ाई का मर्ज कहाँ लाईलाज है

ऐसा सुनते ही एक फ़क़ीर बिफर गया।

शब भर सुनायें थे जिसने वफ़ा के किस्से

सहर होते न जाने वो शख्स किधर गया।

जिसको बताएं थे सारे राज मैने कल ही

जाते जाते आज वो सबको कर खबर गया।

पहले मै था फिर वो आया फिर तर्के-ताल्लुक़ हुआ

इसके बाद ‘विनोद’ छोड़ वो शहर गया।

तिश्नगी – प्यास

विसाल – मिलन

बज़्म- महफ़िल

बावफ़ाई – पूरी तरह समर्पित होना

शब – रात

सहर – सुबह

तर्के-ताल्लुक़ – सम्बन्ध का टूटना

©विनोद रोहतकी

6

क्यों हम एक दूसरे की खबर रखें

कम से कम इतना तो सबर रखें।

भीड़ कितनी भी हो, हाथ ना जो छोड़े

ऐसा कोई साथी, ऐसा कोई मोतबर रखें।

मेरे इश्क़ का ये ख़ात्मा नहीं मेरे सनम

इसके बाद भी मेरे लिए कुछ सफ़र रखें।

समंदर के बस की तो ये बात नहीं रही

है यहाँ कोई, मुझे डूबोने का जो हुनर रखें।

कितनी हसरतें अपनी यूं ही त्याग दी मैने

उसके लिए क्यों फिर सपनो के अंबर रखें|

तू ही कहता है कोई वास्ता नहीं तुझसे ‘विनोद’

फिर ये क्या पल-पल मेरी ही खबर रखें|

मोतबर: विश्वसनीय

©विनोद रोहतकी

7

आलिमों, मैं तुम्हे चौंकाने वाला हूँ

बे-उस्ताद ग़ज़ल कहने वाला हूँ।

मेरा ज़ब्त अभी तुमने देखा कहाँ है

रक़ीब से अपने यारी करने वाला हूँ।

बिल-मुक़ाबिल आ और रोक मुझे

खुद से भी आगे निकलने वाला हूँ।

नए को भी तो पुराना हो जाना है

तभी दकियानूसी होने वाला हूँ।

जिंदगी तुझे एक और मौका दिया

मरता- मरता हुआ जीने वाला हूँ।

अपनी मस्ती से भंवर में कूदा हूँ मैं

किनारे से पूछो, सफ़ीने वाला हूँ।

शायद और भी तीखा लहज़ा हो जाऊँ

तेरी यादों का विष पीने वाला हूँ।

आलिम: विद्वान्

जब्त: खुद पे नियंत्रण

बिल-मुक़ाबिल: आमने-सामने

दकियानूसी: रूढ़िवादी, जो पुराने का समर्थक हो

सफ़ीना: नाँव।

©विनोद रोहतकी

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