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Home / Gazal / गज़ले इम्तियाज़ खान की कलम से . . .

गज़ले इम्तियाज़ खान की कलम से . . .

1.

उसका तबस्सुम था जहां शायद वहीँ पर रह गया

मेरी आँखों का हर इक मंज़र कहीं पर रह गया

 

मैं तो हो कर आ गया आज़ाद उसकी क़ैद से

दिल मगर इस जल्दबाजी में वहीँ पर रह गया

 

वो भी बंजर जिस्म लेकर फिर रहा होगा कहीं

रूह का गुलशन तो उसका भी यहीं पर रह गया

 

दफ’अतन ख्याल ये आता है उसको देख कर

ये सितारा शायद ग़लती से ज़मीं पर रह गया

 

हम लबों को खोल ही न पाए उसके सामने

और ये इलज़ाम भी देखो हमीं पर रह गया

तबस्सुम:- मुस्कान, गुलशन:- बाग, दफअतन:- अचानक या एकदम

 ©इम्तियाज़ खान

 2.

ख्यालों में ठहर कर देखते हैं

ज़रा यादों में जलकर देखते हैं

 

तसव्वुर में मेरा चेहरा तो होगा

तेरी आँखों को पढ़कर देखते हैं

 

सिमट कर रह गए हैं दायरों में

कभी हद से गुज़रकर देखते हैं

 

सफ़र की मुश्किलों में क्या मज़ा है

आज घर से निकलकर देखते हैं

 

जुदा हर टुकड़े का अंदाज़ होगा

चलो हम भी बिखरकर देखते हैं

 

ये कैसे खौफ़ में डूबी हैं आँखें

कि वो खिड़की से डरकर देखते हैं

 

सुकूँ दुनिया में जब मिलता नहीं, माँ

तेरे चेहरे को अकसर देखते हैं

 

ज़मीं पर मेरी टूटी झोंपड़ी को

सितारे भी उतरकर देखते हैं

 

कहीं इम्तियाज़ की दुनिया तो होगी

अब सबसे दूर चलकर देखते हैं

तसव्वुर:- कल्पना

  ©इम्तियाज़ खान

 

3.

जब रात को चाँद सुनाता था वक़्त रुका हुआ सा लगता था

वो दर्द भरा अफसाना मुझको सुना हुआ सा लगता था

 

मुझे ऐतबार की सजा मिली मैं रहमदिली से हार गया

मुझको वो लूट के ले गया जो लुटा हुआ सा लगता था

 

वो जलता रहा अहसास न था वो मिट ही गया तो पता चला

की सारी रौशनी उसकी थी जो बुझा हुआ सा लगता था

 

अश्कों में बह जाते हैं तूफ़ान कई अरमान कई

कल रात वो क़तरा टपक गया जो रुका हुआ सा लगता था

 

वो कहता रहा मैं सुनता रहा इस बार मगर इम्तियाज़ मुझे

हर कोई बहाना उसका सुना हुआ सा लगता था

अश्क़:- आंसू

 ©इम्तियाज़ खान

 4.

किसी के साथ उम्र भर भी तो हो सकता है

कोई दुःख मौत से बढ़कर भी तो हो सकता है

 

ज़माने भर में हम जिसको तलाश करते हैं

वो इस दिल में कहीं अन्दर भी तो हो सकता है

 

मैं जो खामोश हूँ नाराज़ तो न हो मुझसे

ख्यालों में तेरा मंज़र भी तो हो सकता है

 

तुम जिसके पास रख देते हो अपना शीशा दिल

उसके पास कोई पत्थर भी तो हो सकता है

 

वो मेरे सामने पलकें झुकाए बैठे हों

यूँ मेहरबां खुदा हम पर भी तो हो सकता है

 

जो बह नहीं पाते हैं ऐसे अश्कों का

इस दिल में समन्दर भी तो हो सकता है

 

कोई ठुकरा के चला जाए मुहब्बत इम्तियाज़

किसी का ख़्वाब यूँ बंजर भी तो हो सकता है

 ©इम्तियाज़ खान

5.

हमारी मौत से जाना की असर है कि नहीं

उनके काम का वो मंहगा ज़हर है की नहीं

 

खुद अपनी ज़ात को खोया तलाश में जिनकी

मेरी तलाश में भी उनकी नज़र है कि नहीं

 

ऐ चाँद मुन्तज़िर फलक से पूछ ज़रा

हमारी रात की क़िस्मत में सहर है कि नहीं

 

मिटेगा ज़ुल्म भी इंसाफ भी होगा लेकिन

मज़लूम को थोडा सा सब्र है कि नहीं

 

इसी ज़मीन को रौंदा था जिसने पाँव तले

इसी ज़मीन तले उसकी क़ब्र है कि नहीं

 

उलझ बैठा है मेरी कश्ती से अनजाने में

अपने अंजाम की तूफां को ख़बर है कि नहीं

 

नफा उनका तो इम्तियाज़ तूने देख लिया

अपने नुकसान का अंदाज़ा मगर है कि नहीं

मुन्तज़िर:- इंतज़ार करने वाला, सहर:- सुबह, मज़लूम:- जिस पर ज़ुल्म किया जाए

 ©इम्तियाज़ खान

6.

ना रहबरों के बस में है ना क़ाफ़िला ले जाएगा

मेरा जुनूं ले जाएगा मुझको जहां ले जाएगा

 

ख़्वाब-ओ-हक़ीक़त एक है शायद वहां ले जाएगा

कोई सितारा खुद मुझे अपने यहाँ ले जाएगा

 

क्यूँ ख़लिश सीने की आखिर ऐ ख़ुदा मिटती नहीं

ये अकेलापन मुझे जाने कहाँ ले जाएगा

 

बददुआ न बन जाए क़तरा किसी की आँख का

ये आग का सैलाब है सब कुछ तेरा ले जाएगा

 

इतना सफ़र किया कि अब कोई भी साथ में नहीं

वक़्त का ये कारवां जाने कहाँ ले जाएगा

ख़्वाबहक़ीक़त:- ख़्वाब और हक़ीक़त, ख़लिश:- चुभन टीस कसक फ़िक्र दर्द

 ©इम्तियाज़ खान

7.

तसव्वुर नींद का करता हुआ मैं

सर्दी की रात में जगता हुआ मैं

 

समझकर तुझको मंजिल चल रहा हूँ

बरसती धूप में जलता हुआ में

 

जहां पर हूँ वहां पर हूँ नहीं मैं

हमेशा सोच में डूबा हुआ मैं

 

मेरा वजूद ही नहीं हो जैसे

ज़मीं पर बूँद सा गिरता हुआ मैं

 

किसी दिन खुद मिटा डालूं न खुद को

अपने ही आप से लड़ता हुआ मैं

 

खुद अपने ही टुकड़े ढूंड़ता हूँ

कहीं पर टूट कर बिखरा हुआ मैं

 

कोई पत्थर की मूरत बन गया हूँ

किसी का रास्ता तकता हुआ मैं

 

मेरे ज़मीर की गिरफ़्त में हूँ

तुम्हारे सच को सच कहता हुआ मैं

 

न जाने कितनी बार देख चुका हूँ

उम्मीदों का मकां गिरता हुआ मैं

 

मेरी दुनिया में ये ही ज़िन्दगी है

हर लम्हा थोडा सा मरता हुआ मैं

 

इम्तियाज़ टूटता तारा हूँ कोई

न जाने कहाँ गिरता हुआ मैं

तसव्वुर:- कल्पना

 ©इम्तियाज़ खान

 Facebook (imionsky.39@gmail.com)

About admin

5 comments

  1. Very Nice Imtyaz Sir, Shinning Star of poetry..

  2. Bhai imitiyaz khan and storygarbage bahut mubarakbaad..
    Bahut hi khoobsurat ghazlein..
    Dil jeet liya

  3. Soul touching gazal wonderful job, seems like someone write from deep of his hrt.All the best and keep it up ??

  4. An amazing writer.
    Mr. Imtiyaz khan,
    Your poems have a deep meaning, and touch the heart of the person reading the poem.
    I am glad that I have met you, and I can tell- Yeah, I know Imtiyaz, an amazing person and a PERSONALITY. God speed.

  5. Dil choo jati hai har ik line..
    Awesome imi..

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