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कवितायें सुरभि पांडेय की कलम से . . .

मैं क्या करूँ ?

 जिस दुःख का एहसास चार दिनों में तुझे ख़ोखला कर जाता है

वो ग़म मैं हर रोज़ जीती हूँ

जिस जुदाई से तुझे इतनी नफ़रत है

वो दूरियां मुझे भी उतनी ही खलतीं हैं

तू क्यों नहीं समझ पाता मेरी मजबूरियों को

मैं भी जवाबदार हूँ यहाँ इन लोगों को

तू क्यों नहीं कर पाता ऐतबार मेरे प्यार का

कि रूह से तो सिर्फ तेरी हूँ, चाहे जिस्म है बाज़ार का

जिस ख़्वाहिश को सपना समझ तू जीता है

वही चाहत तो मुझे भी इन साँसों की मुहताज रखती है

कि एक दिन सिर्फ़ तेरी हो सकुंगी

इस इंतज़ार में सब कुछ झेल जाती हूँ

लेकिन कभी कभी जब ऐसा लगता है

कि ख़ुद तू ही इल्ज़ामों के ढेर में मुझे दबा रहा है

कि ख़ुद तू ही मेरी मजबूरियों को मेरी अईय्याशी का नाम दे रहा है

तो मैं क्या करूँ ?

मैं क्या करूँ, मैं कहाँ जाऊँ?

किसे अपने दिल कि बात कहूं, किसके कंधे पे चार आंसू बहा लूँ ?

समझ न ऐ मेरे दोस्त! मेरे दलीलों को बेमाना मत जाने दे

तेरी हूँ मुझे तेरे पास आने दे

जिस दुःख के एहसास ने तुझे चार दिनों में झांखोर के रख दिया

वो मेरी हर रात कि आपबीती है

 © सुरभि पांडेय

मेरे हिस्से की कहानी

मेरे हिस्से की कहानी कौन सुनेगा?

मेरे जज़्बात, मेरे आंसू कौन देखेगा?
वो कहता है कि मैं उसे नहीं समझती
उसके हालात उसकी तकलीफें नहीं जानती
वो कहता है मैं मतलबी हूँ

मैं खुद किन तकलीफों से रोज़ गुज़रती हूँ
वो बातें उसको कौन कहेगा?
मेरे हिस्से का दुःख, मेरे हिस्से के ताने
जो सब कुछ मुझे झेलना पड़ता है
उन चीज़ों का वज़न कौन तौलेगा?

अपने दुःख वो मुझे नहीं बताता
मेरी ख़ातिर न जाने क्या-क्या झेलता है
जानती हूँ समझती हूँ
इसलिए तो अपने रोने भी उसके पास नहीं रोती

अपने मन कि हज़ार बातें जो पहले बिना सोचे
बिना समझे उसको कह डालती थी
अब ख़ुद तक सीमित रखती हूँ
बहुत सी ऐसी बातें हैं जो खलती हैं
बहुत से ऐसे वाक्ये हैं जो ठीक नहीं लगते

खून के घूँट पीती हूँ
पर उसको नहीं कहती
लेकिन कभी- कभी मेरे सब्र की डोर भी टूट जाती है
चाहे अनचाहे
मेरी जुबां भी खुल जाती है
टपक जाते हैं दो-चार लफ्ज़ ज़हरीले से
लेकिन वो इस बात को क्यों नहीं समझता

कि इंसान हूँ मैं
ऐसा नहीं कि उसकी क़द्र नहीं है
ऐसा नहीं कि उसकी स्थिति नहीं समझती
लेकिन ये बताओ ना
मेरे हिस्से की कहानी कौन सुनेगा?
मेरे जज़्बात, मेरे आंसू कौन देखेगा?

 © सुरभि पांडेय

वो प्यार करता है

 वो प्यार करता है

समझाता है, समझता है

मेरी बातों को परखता है

जब बिना बात मैं लड़ जाऊं

बचकानी ज़िद पे अड़ जाऊं

जब मैं उसकी बातों को

जान के भी, बेवजह, अकड़ जाऊं

मुझपे गुस्सा करता है

समझाता है, समझता है

मेरी बातों को परखता है

वो प्यार करता है

जब-जब मेरा दिल डरता है

कि कहीं मैं उसको खो ना दूं

जब-जब ये मन घबराता है

यूँ लगता है कि रो ना दूं

बाहों में लेकर, मेरे आंसू पोछता है

समझाता है, समझता है

मेरी बातों को परखता है

वो प्यार करता है

दूरी हमको मंज़ूर नहीं

न मुझे पसंद ना उसे रास

लेकिन अपनी मजबूरियों से

नहीं रह पाते हम हमेशा पास

पर कभी जो मौका मिल जाये

कि एक पल भी जी लें ज़रा

अपने पास बुलाता है

या ख़ुद ही चला आता है

वो प्यार करता है

मेरी आँखों का तारा है

जीने की वजह और सहारा है

उसके चेहरे की वो हँसी

वो प्यारी आँखें, वो दिल्लगी

मुझको दीवाना करती हैं

उसकी ओर ले जाती हैं

उसके बिना नहीं जीना

और कोई बात नहीं

ये मेरा उसका राज़ है

कि वो प्यार करता है

 © सुरभि पांडेय

फिर भी आज भी

  मीलों का सफर साथ तय कर लिया

फिर भी आज भी

जहाँ खड़े थे वहीँ थमे हैं

ना जाने कितने रास्तों से साथ गुज़रे

फिर भी आज भी

जहाँ मिले थे वहीँ रुके हैं

यूँ तो एक दूसरे के बीच के फ़ासले मिटा बैठे हम

फिर भी आज भी

जो समाज हमारे बीच खड़ा था, वो अब भी अड़ा है

लेकिन हम इशकज़ादे हैं,

चाहे कितने भी दुःख झेलने हों

फिर भी आज भी

हाथों में हाथ लिए, चले जा रहे हैं

कल भी चल रहे थे, कल भी बढ़ेंगे

 © सुरभि पांडेय

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