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कवितायें तिशा अग्रवाल की कलम से . . .

मस्ती के वो दो पल

कहाँ गए मस्ती के वो दो पल,

जो हमें पूरी दुनिया से अलग कर जाया करते थे ।

कहाँ गए मस्ती के वो दो पल,

जो भीड़ में न होने के बावजूद, पूरी

दुनिया का एहसास कराया करते थे।

कहाँ गए मस्ती के वो दो पल, जो हमारे

चेहरो पर लंबी. . . मुस्कान छोड़ जाया करते थे।

कहाँ गए मस्ती के वो दो पल,

जो हमें खिलखिला कर हँसा दिया करते थे।

किस्मत की रज़ा कहो या हँसने की सजा,

गुम हो गए मस्ती के वो दो पल जब हँसते

थे हम खुल कर।

यारी थी, दोस्ती थी, प्यार था, हसीं ये सारा

जहां था,

लरखरा गये जो हमारे कदम ज़िंदगी

की इस भागदौड़ में, न जाने कहाँ गुम

हो गए मस्ती के वो दो पल जब जीते थे

हम खुलकर. . . खुलकर।

© तिशा अग्रवाल

लौट कर आये हम

वो चेहरा, वो हँसी, वो आवाज़,

वो मुस्कान, भले ही जितने दूर हो

जाये, हमेशा दिल के पास है, हमेशा

दिल के साथ है।उन बदमाशियों को,

उन छेड़खानियों को चाह कर भी

खुद से दूर न कर पाएंगे हम,

तेरी निशानियाँ जो मेरे पास है,

उसे अपनी यादों से कैसे मिटा पाएंगे हम।

दूर होने को तो हो जायेंगे हम,

पर उन बीते लम्हों को अपने ख्यालों

में आने से कैसे रोक पायेंगे हम।

आखिर कैसे भूल जाएंगे हम वो

हसीं पल, जो हमने तेरी नज़रों

के सामने बिताये है।

वो पल जिनमे तेरी हँसी और हमारी ख़ुशी है।

वो पल जिनमे तेरी नादानियाँ और

हमारी बचकानिया है।

याद रखना , भले ही लौट कर ना आये हम,

भले ही लौट कर न आये हम. . . ।

© तिशा अग्रवाल

कागज़

लोगों को अपनी बात बताने की

लाख कोशिश की, पर सुकून तब ही मिला

जब बीना आधी अधूरी बात जाने,

बिना सही गलत का फैसला किये,

कागज़ के उस टुकड़े ने मेरी बात सुनी,

मुझे अपनी बात रखने का मौका दिया।

बिन कुछ कहे मेरे हर सवालो के जवाब

दे गया. . . ।

 दुनिया की कशमकश में

हम भूल ही गए की इंसान का

सबसे अच्छा साथी वो खुद है,

क्या सही है, क्या गलत है,

ये वो दुनिया कैसे बताएगी जो

खुद भगवन से भी दुखी है।

© तिशा अग्रवाल

खूब आता है हमे

दुनिया से टूट कर अपने

ख़यालों में खोना, खूब

आता है हमें।

कब ये दुनिया-दुनिया सी

नहीं लगती, इस सोच में

डूबना भी खूब आता है हमें।

हवाओं के साथ उड़

कर कहीं दूर चले जाना,

 खूब आता है हमें।

अपनी ही नज़रो के

सामने से गायब हो जाना,

खूब आता है हमें।

© तिशा अग्रवाल

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