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कवितायें इम्तियाज़ खान की कलम से . . .

जाने वो कौन सी दुनिया है

जाने वो कौन सी दुनिया है

जहां जाकर कोई नहीं आता

आसमानों से भी दूर कहीं

ज़मीन का कुछ तो है नाता

जाने वो कौनसी दुनिया है

नींद जहां से चलकर आती है

है खुद ही जब यहाँ भेजा

फिर वापस क्यूँ बुलाती है

जाने वो कौनसी दुनिया है

तक़दीर जहां पर बनती है

इंसानों के चेहरे की

तस्वीर जहां पर बनती है

जाने वो कौनसी दुनिया है

क़तरा इन्सां कर देती है

जो सहराओं को सब्ज़ करे

सागर सहरा कर देती है

जाने वो कौन सी दुनिया है

दुआएं जहां सब जाती हैं

जहां रूह बनायी जाती है

उम्मीदें जहां से आती हैं

जाने वो कौनसी दुनिया है

सुबह जहां से आती है

जहां सितारों को नूर मिले

शब जहां को वापस जाती है

जाने वो कौनसी दुनिया है

जो फूलों में रंग भरती है

पानी को बेरंग रखती है

जो तितली में रंग भरती है

जाने वो कौनसी दुनिया है

इम्तियाज़ कोई बतलाए मुझे

सवाल जो इतने सारे हैं

जवाब कोई बतलाए मुझे

सहरा:-मरुस्थल, सब्ज़:-हरा, क़तरा:-बूँद, शब:-रात

 ©इम्तियाज़ खान

 

तलाक़

तलाक़ दे रहे हो ये जवाब लौटा दो

या जवानी मेरी रंगीं गुलाब लौटा दो

मेहर हक़ है मेरा वो मगर तुम ही रख लो

मुझे वापस महज़ मेरा शबाब लौटा दो

भूल बैठी हूँ तेरे घर को घर बनाने में

मेरी अदाएं वो मुझको जनाब लौटा दो

तुम्हारे साथ एक हसीन ज़िन्दगानी का

जो मैंने देखा था मेरा वो ख्वाब लौटा दो

दुआओं में जो तेरे लिए बहाया है

वो मेरे आंसुओं का सैलाब लौटा दो

छोड़ आई तेरी खातिर जिसे मैं माँ के घर

बस मेरी ज़िन्दगी की वो किताब लौटा दो

तलाक दे रहे हो ये जवाब लौटा दो

या जवानी मेरी रंगीं गुलाब लौटा दो

 ©इम्तियाज़ खान

अब मैं जो चला गया हूँ

अब मैं जो चला गया हूँ

तो क्या चला गया है ?

जीत हार भी यहीं है

हर बहार भी यहीं है

हैं नफरतें यहीं पर
और प्यार भी यहीं है

अब मैं जो चला गया हूँ

तो क्या बदल गया है ?

अंदाज़ भी वही है

मिज़ाज भी वही है

हर ताईर-ऐ-फलक की

परवाज़ भी वही है

जागती आँखों से देखा

हर ख़्वाब भी वही है

ना चाँद ही है बदला

आफ़ताब भी वही है

अब मैं जो चला गया हूँ

क्या बदल गयी है दुनिया ?

बहती है अब भी दुनिया

रहती है अब भी दुनिया

जाते हैं जाने वाले

कहती है अब भी दुनिया

अब मैं जो यहाँ नहीं हूँ

क्या खो दिया किसी ने ?

इक इन्सान इस जहाँ ने

एक बेटा एक माँ ने

एक भाई किसी बहन ने

और साथी किसी दुल्हन ने

अब मैं जो चला गया हूँ

बस मैं ही चला गया हूँ

सब कुछ मगर यहीं है

कुछ है अगर यहीं है

पर मैं तो चला गया हूँ

अब मैं तो चला गया हूँ

ताईरफलक:- आसमान का पक्षी, परवाज़:- उड़ान, आफ़ताब:- सूरज

 ©इम्तियाज़ खान

 Facebook (imionsky.39@gmail.com)

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One comment

  1. Wonderful job its really soul touch wordings and lines Masha Allah kamal ka likhte hai aap imi, god bless u nd keep it up

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