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कवितायें आकांक्षा भटनागर की कलम से . . .

ज़िन्दगी जो अब बेस्वाद लगने लगी है”

रह गुज़र सा रह गया हूँ
हवा के इंतज़ार में
बारिश भी अब
वो सुकून नहीं दे पाती
ज़िन्दगी जो अब बेस्वाद लगने लगी है

अकेले दिल को बहलाता हूँ
बैठा है जो अंधकार में
मिलन भी अब
वो ख़ुशी नहीं दे पाती
ज़िन्दगी जो अब बेस्वाद लगने लगी है

खोए मन को ढूंढ लाता हूँ
गुम हुआ था जो बहार में
साथ भी अब
वो सहारा नहीं दे पाता
ज़िन्दगी जो अब बेस्वाद लगने लगी है

हमेशा अकेला पाता हूँ
खुद को मैं इस भीड़ में
कोई नज़र भी अब
अपनी न लग पाती
ज़िन्दगी जो अब बेस्वाद लगने लगी है

खुद ही दिल को फुसलाता हूँ
इस बंद कीबाड़ में
कोई शख्स भी अब
मन को न लुभा पाता
ज़िन्दगी जो अब बेस्वाद लगने लगी है

ऊँचा जो देख लेता हूँ
खुले आसमान में
कोई तरंग भी अब
सपनो को ऊंचाई नहीं दे पाती
ज़िन्दगी जो अब बेस्वाद लगने लगी है

©आकांक्षा भटनागर

आज मेरा दिल उदास है!

आज भी नज़रें ताकती हैं दरवाज़े को
तेरे आने का इंतज़ार है मेरी आँखों को,
बिन तेरे ये घर बे-आवाज़ है
आज मेरा दिल उदास है!

परीक्षा का समय था जब आने को
एक तू ही जागी थी मेरे लिए रातों को,
तेरी रूह आज भी मेरे पास है
आज मेरा दिल उदास है!

समेटा हुआ था कुछ ऐसे संकटों ने मुझको
दुआ तेरी, कि मेरी हर परेशानी मिले तुझको,
तेरे होने का आज भी मुझे एहसास है
आज मेरा दिल उदास है!

हर वक़्त याद करता हूँ उन पलों को
काश मेरी ज़िन्दगी मिल जाती तेरी साँसों को,
माँ, तू आज भी हर पल मेरे लिए ख़ास है
आज मेरा दिल उदास है!

©आकांक्षा भटनागर

Fb-https://m.facebook.com/akankshaab?ref=bookmarks

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