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कवितायें अर्पित कुलश्रेष्ठ की कलम से . . .

यातनायें

तेरे इश्क़ से बेहद इश्क़ किया

मर मिटना तो बहुत आसान बात थी

मैने तो अपनी रूह को तेरे लिए कुर्बान किया

पर क्या सिला दिया तूने मेरी मोहबत का

मुझे अपने दूसरे आशिक़ो के साथ इश्क़ की पथरीली सड़क पर लहूलुहान छोड़ दिया

अरे! क्या फर्क रहा उनमे और मुझमे तेरे लिए ऐ ज़ालिमा!

उनकी तरह तूने मुझे भी सिर्फ ज़रूरत पर ही याद किया

मेरे इश्क़ का तूने ऐसा सिला दिया की मेरी रूह तक को कचोटता हुआ अकेला छोड़ दिया

कहा गए वो कसमे वादे

भूल गई तू सारे

शायद इसलिए आज भी ये कठोर दिमाग तुझे यातनाये देता है

पर सुनता कौन है उस दिमाग की

क्योंकि मेरी रूह से बहता हुआ एक एक कतरा लहू का आज भी तेरे लिए दुआए देता है

 ©अर्पित  कुलश्रेष्ठ 

तन्हाइयां

दिन भर तन्हाई में जीये,

हर शाम अकेले भी रह लिये,

सोचा था एक दिन मिलन होगा उनसे ,

पर सारा जीवन अंधकार में जी लिये,

फिर एक दिन आहट आयी उनकी ,

उन्हें देख जी भर रो लिये,

काश! ये सब ख्वाब न हो

उनकी आहट रुस्वा ना हो ,

मन करता है जी भर के गले लगालू उन्हें ,

ताकि जब आँख खुले तो कोई मलाल न हो।

 ©अर्पित  कुलश्रेष्ठ 

माँबाप

वो राजा है वो रंक भी

वो साधु है वो संत भी

यह सारी बाते माना की किताबी नहीं है

पर सच बताऊ तो वो हस्ती परमात्मा है मेरी

सबका भगवान है बनकर बैठा जो

सबका भगवान है बनकर बैठा जो

चाहे उसका नाम तुम कुछ भी लो

पर जब जब तुमहारे उस भगवान ने है मुँह मोड़ा

मुझे पथरीली सड़को पर लात मार के है छोड़ा

तब इस परमात्मा ने मेरी बागडोर है संभाली

और उस पथरीली यात्रा को स्वर्ण नियम है बना डाली

सच कहता हूं

सच कहता हूं

इस दुनिया में कोई भगवान नहीं है

है तो बस एक परमात्मा

जिन्हें प्यार से मैं अपने माँ बाप कहता हूं

 ©अर्पित  कुलश्रेष्ठ 

तेरा जूनून

तेरी राह में डट कर खड़ा है वो

कितनी भी परेशानिया आयी पर उन्हें झेल बेसुध अड़ा है वो

चाहे तू माने ना माने उसकी मोहब्बत को

पर तेरे लिए अपनी जान तक को हथेली पर लिए खड़ा है वो

कौन कहता है प्यार में जान देने वाले बेवकूफ होते है

देख उसे एक बार

अपनी रूह तक को प्यार में बेचने के लिए तैयार खड़ा है वो

जान बसती है उसकी तुझ में

कयूकि अपने आपको तेरा आशिक़ माने पड़ा है वो

पर कहते है ना हर सच्चे इश्क़ की मंज़िल नहीं होती

इस बात से वाकिफ होते हुए भी अनजान खड़ा है वो

 ©अर्पित  कुलश्रेष्ठ 

मेरा सफ़र

इस राह पर चल रहा था वो

कांटे चुभे थे फिर भी डट रहा था वो

पत्थर भी मिले उससे राह में

तो उन्होंने इससे पूछा की यह क्या कर रहा था वो

वो थोड़ा मुस्कुराया और बोला

मै तो बस मंज़िल की और बढ़ रहा हु

समय के साथ तालमेल कर रहा हु

ऐ पत्थरी हुस्न देख ज़रा अपने आपको

कम से कम मै समय के साथ चहलकदमी कर तो रहा हु

बिना किसी को चोट पहुचाये मै अपना काम कर रहा हु

शायद यही वजह है तू विशाल होकर भी खाली है

और मै तुझे रौंदते हुए आगे बढ़ रहा हु

 ©अर्पित  कुलश्रेष्ठ 

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