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कवितायें अभिषेक व्यास की कलम से . . .

मेरे मज़हब की जंजीरें

मेरे मज़हब की जंजीरें,
मुझे कैदी बनाएं,
मेरी आत्मा, मेरे तन को जैसे छोड़ जाए,
मुझे मालूम ना था इस कदर और यूहं बटूंगा ,
मेरे मज़हब की मशाल मे , मैं यूहं जलूँगा।

कोई पगड़ी, कोई बुरका , कोई जनेउ पहनें,
मजहब के नाम पर यहाँ अनेक चेहरै,
धरती से आसमान की, जो है उंचाई,
मेरे की भी मानो यही है गहराई।

बेज़ुबान जानवर भी यहाँ काटे जाते,
पत्थर – कंकड़ यहाँ ईश्वर कहलाते,
मज़हब के नाम पर हम रोज़ लूटे जाते,
यह फ़कीर और ढोंगी ही , लुटेरे कहलाते।

मेरे महजब की जंजीरें
मुझे कैदी बनाएं,
मैं इन्सान एक , हैं मेरे अनेक साएँ,
मज़हब की कैद धर्म का मुझे मार्ग दिखाए,
और मेझहब की कैद ही मुझे पापी बनायें,

अंतिम विचार , मेरा केवल यही है,
यह धर्म का मार्ग, घना जंगल नहीं है,
ईश्वर से जुड़ने का यह मार्ग एक ही है,
अगर अपने करम , इरादे नेक ही है।

 ©अभिषेक  व्यास

आत्मनिर्भर

हर स्त्री है आत्मनिर्भर,

जो गिरते सँभलते अपना मुकाम पाए,
जो दो परिवारों का मान बढाऐ,
माँ की ममता का प्रतीक कहलाए
एक संगिनी बन साथ चल जाए,
साथी बन साथ निभाएं,
आज हर खेल अपने नाम कर जाए,
जो देश का सम्मान कहलाए,
पानी बन हर सांचे में ढल जाए,
प्रशंसा के योग्य कहलाए।।

आत्मनिर्भरता जिसकी है अपार,
पिता का सम्मान और प्यार ,

इतिहास गवाह है उनका ,
रानी झाँसी नाम है जिसका ,
ऐसी कुशल और परिपूर्ण वो,
जीत का भी शीश झुखाकर,
अपने पदचिन्ह इस धरती पर,
रखकर बनि वो निपुण और निडर ,
हर स्त्री है आत्मनिर्भर।।
हर स्त्री है आत्मनिर्भर।।

 ©अभिषेक  व्यास

FB link : @poetrybyvyas

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