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कवितायें अंशुल जोशी की कलम से . . .

क्या

क्या नहीं क्यों का सवाल होगा

जिस रोज़ क़यामत आएगी, बवाल होगा

मज़हब, धर्म, जात , पात

किसी का हवाला ना होगा

जो हाल मेरा होगा

वही तुम्हारा हाल होगा

जिस रोज़ क़यामत आएगी, बवाल होगा

दिल से दिलों का मेल होगा

हाथो से हाथ मिलेंगे

उस वक़्त कुदरत का लाजवाब कमाल होगा

जिस रोज़ क़यामत आएगी, बवाल होगा

उस रोज़ सब समझेंगे दूसरों की उलझने

एक डोर से बंधे सब, एकता का जाल होगा

जिस रोज़ क़यामत आएगी, बवाल होगा

 ©अंशुल जोशी

 

शिनाख्त

शिनाख्त हुई दिल की तो पता चला

सुकून कही गायब है

कुछ लम्हें बदहाल है

कुछ जज़्बात छुपे हुए है

साँसे मुश्किल से चलती है

कुछ राज़ के बोझ से दबी हुई है

कुछ हया के फंदों में फ़सी हुई है

शिनाख्त हुई दिल की तो पता चला

अधूरे सपने अँधेरे में कैद है

उम्मीदें जकड़ी हुई जंज़ीरों से

‘मलाल’ मुस्कुरा रहा है

जब रोज़ मय का घूँट उतरता है

गुज़रता हैं दिल के पास से

दिल रोता है सोच कर

जब नशे में होते हो बस तब ही बात करते हो

शिनाख्त हुई दिल की तो पता चला

तुमने जिम्मेदारी के बहाने दिए है

तुमने मजबूरी को हथियार बनाया है

यह मासूम सा दिल इससे कैसे कैसे फरेब किए

आज शिनाख्त हुई तो पता चला

 ©अंशुल जोशी

 

पत्ते

टूटे बिखरे पत्ते मिले राख बनकर

जो कभी जुदा हो गए थे हवाओं के ज़ोर से

शाखों ने झटका जब, ज़मीन में जा लिपटे

वही पत्ते गिरे , जो थे ज़रा कमज़ोर से

और वह पत्ते लहलहाते नाचते रहे

जो थे साथ में , बंधे प्यार की डोर से

वह पत्ते जो गिरे हुए थे , हार मान के बैठे थे

हर वक़्त डरे रहते थे , वह कदमो के शोर से

बिना कुछ गलत किये सोचते , कही रौंधे ना जाए

ऐसी नियत को गले लगाए , लगते थे वह चोर से

सूखे हुए मायूस थे अपनी ज़िन्दगी से

देख ना पाए बादल घनघोर से

टूटे बिखरे पत्ते मिले राख बनकर

जो गिरे थे पेड के छोर से

टूटे बिखरे पत्ते मिले राख बनकर

जो ना देख पाए मंज़िलो को गुज़रता अपनी ओर से

©अंशुल जोशी

घर

आओ घर चलेंं, बहुत काम कर लिया

अब घर बुलाता है, आओ घर चलेंं

पता चला हैकि वह झूला जो पेड़ से बंधा हुआ था

उसे उतारा जा रहा है

वह पेड़ जिसमें जगह जगहहम अपने अड्डे बनाया करते थे

मुरझा गया हैं, सूखगया है

आओ घर चलें, उस झूले के संग पल बिताए

उस पेड़ की बाहों में लटके

आओ घर चलेंं, बहुत काम कर लिया

अब घर बुलाता है, आओ घर चलें

घर जाएंगे तो शाम से मिलेंगे

दोपहर संग खेलेंगे

घर जाएंगे तो दाल चावल खा कर

कम्बल ओढ़ के सो जाएंगे

आज काम से वापस लौट कर भी , आराम नहीं मिलता

अब घर बुलाता हैं, आओ आराम कर लें

आओ घर चलें, बहुत काम कर लिया

घर के दीवार पर टँगी घड़ी की टिक टिक सुनेंगे

घर जाएंगे तो ‘सुकून’ से मिलेंगे

आओ घर चलें, बहुत काम कर लिया

अब घर बुलाता है, आओ घर चलें

घर जाएंगे तो रोटियाँ सिकते हुए देखेंगे

बैठ कर मटर छीलेंगे

पता चला है, अबकी बार अमरुद मीठे निकलें हैं

चलो घर चल के अमरुद तोड़ेंगे

आओ घर चलें, बहुत काम कर लिया

अब घर बुलाता है, आओ घर चलें

आओ घर चलें, बक्से से पुराने खिलौने निकालें

उनमे जमी हुई मैल को साफ़ करदें

घर के आँगन में बहुत अरसे से कुर्सियां नहीं डाली गयीं

पड़ोसी नहीं बैठे, गुफ्तगू नहीं हुई

आओ घर चलें, पतझड़ का मौसम भी है

आओ घर चलें, बहुत काम कर लिया

अब घर बुलाता है, आओ घर चलें

पता चला है कि एक खेल का मैदान थाबहुत बड़ा

जो अब बंजर हो गया है

घर जाएंगे तो , मैदान को पानी डाल कर उपजाएंगे

पकड़म पकड़ाई, उच्च नीच खेलेंगे

आओ घर चलें, बहुत काम कर लिया

अब घर बुलाता है, आओ घर चलें

आओ घर चलें,

पता चला हैकि नए पड़ोसी आये हैं जिनकी दो लड़कियां है और वह भी हमउम्र हैं

घर जाएंगे तो खिड़की से झाकेंगे

छत्त पर बैठ डोरे डालेंगे

आओ घर चलें, बहुत काम कर लिया

अब घर बुलाता है, आओ घर चलें

काफ़ी समय से सिर्फ बैठे ही रहे हैं, तकिया सर सेलगाकर लेटेनहीं हैं

काफ़ी समय से किसी और की प्लेट में खाना रखकर किसी और की चम्मच से खा रहे हैं

घर जाएंगे तो खुद के बर्तन झूठे करेंगे

खुद की मेज़ में खाना रखेंगे

आओ घर चलें, बहुत काम कर लिया

अब घर बुलाता है, आओ घर चलें

पता चला है, अभी भी लोग मेरा हाल चाल पूछते हैं

मुझे याद करते हैं मेरे किस्से सुनाते हैं

मैं बड़े शहर में पहचान बनाते बनातेभूल गया कि

मेरे शहर में भी मेरी एक पहचान थी

घर जाएंगे तो सबसे हाथ मिलाएंगे

सबके लिए तोहफे ले जाएंगे

आओ घर चलें, बहुत काम कर लिया

अब घर बुलाता है, आओ घर चलें

यहाँ रोज़ मर्रा की ज़रूरतों पर पैसे खर्च सारे हो जाते हैं

पता चला है, घर में आज तक मेरे गुल्लक से खन-खन की आवाज़ आती हैं

घर जाएंगे तो सिक्के गिनेंगे

वही खन-खन की आवाज़ सुनेंगे

आओ घर चलें, बहुत काम कर लिया

अब घर बुलाता है, आओ घर चलें

मेरे काम ने मुझे, मेरे पैरों पर चलना सिखा दिया

मुझे दुनिया से लड़ना सिखा दिया

मेरे काम ने मुझे पैसे तोदिए, पर चैन नहीं दे सका

मेरे काम ने मुझसे बिस्तर खरीदवा लिया, पर नींद नहीं दे सका

घर जाएंगे तोतारे गिनेंगे

घरजाएंगे तोख़्वाब बुनेंगे

आओ घर चलें, बहुत काम कर लिया

अब घर बुलाता है, आओ घर चलें

©अंशुल जोशी

मेरी दुनिया में

मेरी दुनिया में कुछ हो न हो

एक घर मेरा हो एक घर तुम्हारा हो

छोटा सा ही सही समुन्दर हो लेकिन

एक किनारा मेरा हो एक किनारा तुम्हारा हो

ज़रा सी बारिश की ही ज़रूरत हैं

एक बादल मेरा हो एक बादल तुम्हारा हो

बस दो ही चराग़ जलते हुए दिखाई दें

एक चराग़ मेरा हो एक चराग़ तुम्हारा हो

इश्क़ के दास्तां की कहानी हो लिखी हुई जिसमें

एक पन्ना मेरा हो एक पन्ना तुम्हारा हो

मेरी दुनिया में धड़कने सुनाई दे, ऐसे जैसे

एक दिल मेरा हो एक दिल तुम्हारा हो

बस दो रंग से ही दुनिया रंगीन हो जाए

एक रंग मेरा हो एक रंग तुम्हारा हो

हम दोनों इश्क़ की डोर से बंधे हो, जिसका

एक सिरा मेरा हो एक सिरा तुम्हारा हो

एक चाँद हो एकतारा हो

आधा मेरा हो आधा तुम्हारा हो

एक सूरज हो एक आसमान हो

आधा मेरा हो आधा तुम्हारा हो

दो ही मौसम हो मगर हो मुकम्मल

एक सावन मेरा हो एक पतझड़ तुम्हारा हो

मेरी दुनिया में कुछ हो ना हो

एक घर मेरा हो एक घर तुम्हारा हो

©अंशुल जोशी

ग़ज़ल

तुम्हें सोचते हुए जब भी कुछ लिखता हूँ

न जाने कैसे एक खूबसूरत सी ग़ज़ल तैयार हो जाती है

जैसे ही तुम्हारा तसव्वुर होता है

खुद-ब-खुद खोए हुए अल्फ़ाज़ सामने आ जाते हैं

उस पहर जब तुम गुज़री थी गलियों से मेरी

मेरी डायरी में लिखी नज़्में मुस्कुराने लगी

तुम्हारा सामने होना ना होना महज वक्त का तकाजा था

हर पल तुम्हारा एहसास जो मेरी ग़ज़लों में कैद है

जब भी तुम्हारा नाम लेता हूँ

कोरा कागज लहराने लगता है

उसे इंतजार रहता है कि मेरे लिखते ही

ये सादा पन्ना ज़िन्दगी भर मेहफूज रहेगा

आज भी लोग जब मेरी ग़ज़लें पढ़ते हैं

तुमसे मिलते हैं रूबरू होते हैं

सोच फारिग हैं मगर कुछ आदत ऐसी हैं

ज़ेहन में मशगूल हैं बस एक चेहरा तुम्हारा ही

अब ऐसे हालात कैसे बयान करु दुनिया के सामने

जो मानती हैं कि घर में एक बड़ा शायर क्या खूब लिखता हैं।।

©अंशुल जोशी

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