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इलायची फलेवर वाला बिस्कुत by नेहा रावत

 इलायची फलेवर वाला बिस्कुत

जाने क्यों कहीं न कहीं से हम लौट ही आते है अपने बचपन की ओर,क्योकिं एक तरह से वही शुरूआत और अंत भी वही है।वही बचपन कब बुढा़पे में बदल जाता है पता ही नही चलता,बस हम तो दिन याद करते रह जाते है।इस घोर व्यथा में थी की अपनी भावनाओं को किस रुप में उतारू, एक कविता में ? फिर सोचा क्यूं ना एक छोटी सी कहानी ही लिख डालू ,भला इससे बहतर क्या होगा हैं न? मैं जब अपनी थिएटर की वर्कशाप से रात को वापस आती हूँ तो बस से ही सफर करती हूँ ,बाहर से आने वाली हवा का डेढ़ -दो घंटा पूरा मज़ा लेती हूँ।वो हवा जो शायद आमतौर पर इतनी महसूस न होती हो वो अचानक से बस की रफ़तार से टकरा के खिल उठती है और मेरे तन मन को महका देती है।एक गज़ब बात है,अकसर रात को सफर करते वक्त इन हवाओं में मुझे वो बचपन में जो इलायची फलेवर का बिस्कुत मैं खाया करती थी ,उस बिस्कुत की खुशबू उन हवाओं से आती है।वो इलायची की ख़ुशबू।आह।सच बताऊं तो ये ख़ुश्बू मन को महका देती है।बचपन की याद आ जाती है। बस में सफर करते वक्त ये हवाऐं पलकों पर  भारी होने लगती है और फिर में डूब जाती हूँ  एक दूर भविष्यों के ख्यालों में जिनकी वज़ह से हम बचपन से दूर हो गए,न जाने कब बड़े हो गए। आज भी याद है मुझे जब गुड्डे बिस्कुट दस रूपए का आता था तब वो बिस्कुट कुछ महंगा प्रतीत होता था।सोचती थी की दस रूपय में तो न जाने ही हम कितनी चीज़ों का आनंद उठा लेंगे और शायद तब भी कुछ चिल्लर जेब में बचे पड़े मिलेंगे,इसलिए सस्ता और मज़ेदार स्वाद बस पाँच रुपए वाले क्रीम बिस्कुट में ही था। और महंगाई से बचने का टिकाऊ उपाय भी ।आनंद। वो पल भी मुझे अच्चे याद है जब पापा अपने सर के सफ़ेद बाल मुझे तोड़ने को कहते थे और इस काम को करने के लिए मुझे पैसों का लालच दिया करते थे । दस बाल का एक रूपए और पंद्रह-बीस का दो रुपए,मैं हैरान होती थी की इतनी मेहनत के बस इतने रूपये, ये तो नाइंसाफी है इसलिए ना-ना करके दाम बड़वा ही लेती थी।घर के बगल में ही दुकान थी और दिल करता था की कोई महरबानी करके दो-चार रूपये दे तो मालूम पड़े मार्किट में क्या-क्या नया आया। आमपापड़,सतमोला,चांद सितारे,इक्लेयरर्स,जैली और वो दो रूपय वाली लौटरी जिसमें ज्यादातर हार ही हाथ लगती और फिर कुछ समय के लिए मन उदास हो जाता।लेकिन बचपन तो आखिर बचपन है मन चंचल है दो पल में खुश दो पल में उदास।इतनी भीड़ भाड़ में ये पल ओझल हो गए और एक दिन याद आए भी तो वो हवा को महकाते इलायची बिस्कुट। आज कहाँ से कहाँ पहुँच गए पर बचपन न छूटा।वक्त का पहिया दौड़ रहा है और बचपन उसके तले पीस चुका है।न जाने कितने समय से उस फलेवर का बिस्कुट नहीं खाया था मैनें ।लेकिन एक शाम दोस्त के साथ बस स्टैंड पर बैठे उस बिस्कुट का लुफ्त जरूर लिया । खाते वक्त जो आनंद मिला तो लगा मानो तेज़ गति से स्वर्ग पहुँच चुकी हूँ।आह।मज़ेदार।।लाज़वाब।शायद ये सब पढ़कर कोई ये समझने लगे की मैं पागल हो चुकी हूँ या मेरी ये बाते कुछ अजीब मालूम पड़े लेकिन क्या करू बचपना इस मोड़ पर लाए देता है।मैं शायद जानती हूँ की यह महक किसी प्रकार के वृक्षों से आती है पर मानती तो उसे अब भी वो बचपन की महक ही हूँ।वो स्वाद जो आज भी जुबान पर ताज़ा है,जैसे बचपन की यादे इस हृदय में।ओ काश वो बचपन लौट आता और तब शायद मेरे अंदर ये व्यथा नही होती की मुझे वो यादें अपने अनुभवों में खोझनी पड़ेंगी और तब वो मुझसे इस तरह अलग न होकर मेरे भीतर होता।इस तरह हवाओं में बचपन को खोज रही हूँ जो बस की रफतार से भी तेज़ रफतार से पीछे छूट गया है।मौका जो कभी दुबारा मिले तो फिर से बच्चा बनना चाँहूगीं और वो पल उस समय के दरपन में खोना चाँहूगीं।इतनी जल्दी के तहत मरती जा रही हूँ,अगर हो सके तो फिर से जीना चाँहूगीं।

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